क्रिप्टोकरेंसी बाजार में बिटकॉइन को अक्सर डिजिटल सोना कहकर उसकी दुर्लभता और निष्कर्षत: ऊँचे मूल्य के आधार पर समझाया जाता रहा है। परन्तु हालिया चर्चा और आलोचना यह संकेत देती है कि बिटकॉइन की पुरानी धारणा पर पुनर्विचार की जरूरत है और निवेशक तथा विशेषज्ञ इस पर नए सिरे से बहस कर रहे हैं।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि तकनीकी रूप से बिटकॉइन की अधिकतम आपूर्ति 21 मिलियन सिक्कों तक सीमित है। यह एक कोडेड नियम है जो सतोशी नाकामोतो द्वारा डिजाइन किया गया था। गोल्ड की तुलना में यह वैश्विक बाजार में सांकेतिक रूप से एक ‘सीमित’ संपत्ति बनाता है, जो मुद्रास्फीति से बचाव के लिए निवेशकों को आकर्षित करता है।
सिर्फ आपूर्ति की सीमा ही मूल्य नहीं बनाती
फिर भी, नवीनतम विचार यह है कि सिर्फ आपूर्ति की सीमा ही मूल्य नहीं बनाती। निवेशक अब यह देख रहे हैं कि मांग, उपयोगिता, बाजार की अस्थिरता और व्यापक आर्थिक परिस्थिति बिटकॉइन की कमी से भी अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एक संपत्ति तभी वास्तविक रूप से मूल्यवान होगी जब उपयोग करने वाले, लेन-देन करने वाले या बचत के रूप में रखने वाले पर्याप्त लोग हों और बाजार की धारणा सकारात्मक हो।
ऐसा भी कहा जा रहा है कि बिटकॉइन के “दुर्लभ होने” का कथित लाभ कभी-कभी भ्रम पर आधारित होता है। आलोचकों का तर्क है कि तकनीकी कोड के कारण आपूर्ति सीमित दिखती है, पर समुदाय की सहमति बदल जाने पर आपूर्ति नियम भी बदले जा सकते हैं, यानि कोड में संशोधन संभव है यदि अधिकांश नेटवर्क इसे स्वीकार कर लें।
लगभग 95% बिटकॉइन पहले ही खोजे जा चुके हैं
इसके अलावा, सैद्धांतिक रूप से बिटकॉइन को दुर्लभ मान लेने में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान में लगभग 95 प्रतिशत बिटकॉइन पहले ही खोजे जा चुके हैं और शेष बहुत धीरे-धीरे आने वाले दशकों में जारी होंगे। निवेशक इस तथ्य को दुर्लभता के समर्थन में देखते हैं, पर इसका वास्तविक प्रभाव बाजार की भावनाओं पर निर्भर करता है।
क्या आप जानते हैं: एलोन मस्क के इस ट्वीट के बाद, Dogecoin की कीमत में तेज उछाल
‘दुर्लभता’ की धारणा पर प्रश्न
साथ ही, ‘दुर्लभता’ की धारणा पर यह प्रश्न उठता है कि जितने सिक्के खो चुके हैं या पहुंच से बाहर हैं, वे बाजार में वापस नहीं आएंगे। ऐसी स्थिति में वास्तविक बाजार में उपलब्ध बिटकॉइन की संख्या और भी कम हो सकती है, जिससे प्रभावी आपूर्ति घटती है। पर क्या यह मूल्य बढ़ाने वाला कारक है या नहीं, यह मांग-आधारित निर्णय है।
किसी अन्य दृष्टिकोण से देखा जाए, तो बिटकॉइन के मूल्य और मुद्रास्फीति-प्रतिरोधक क्षमता पर सवाल उठाते हुए यह भी कही गई है कि आर्थिक रूप से ‘मूल्य’ का निर्माण सिर्फ सीमित आपूर्ति से नहीं होता बल्कि उससे भी अधिक यह महत्वपूर्ण है कि क्या वह वस्तु लेन-देन का माध्यम, भुगतान में स्वीकार्यता और मूल्य-भंडार के रूप में स्थिरता प्रदान कर सकती है।
कुछ अर्थशास्त्रियों के अनुसार बिटकॉइन इन मानदंडों को पूरी तरह से नहीं पूरा करता। अतः इसे सशर्त निवेश संपत्ति कह सकते हैं, वास्तविक मुद्रा नहीं। बाजार की मौजूदा अस्थिरता और विशेषज्ञों के विचार इस बहस को और अधिक जटिल बनाते हैं।
क्रिप्टो बाजार में लगातार उतार-चढ़ाव, कीमत में भारी गिरावट की चेतावनियाँ, और योगात्मक जोखिम निवेशकों को सतर्क बनाते हैं, जिससे बिटकॉइन को सिर्फ “सीमित आपूर्ति वाला संपत्ति” कहने की पुरानी धारणा को चुनौती मिलती है।
निष्कर्ष
बिटकॉइन की दुर्लभता पर आधारित मूल्य संरचना पर निवेशकों और विशेषज्ञों के बीच नई बहस उभर रही है। जहाँ कुछ इसे स्थिर निवेश विकल्प और डिजिटल सोना मानते हैं, वहीं कुछ विशेषज्ञ और आलोचक सीमित आपूर्ति के दावे पर प्रश्न उठाते हैं और मूल्य के निर्धारण में मांग, उपयोगिता एवं बाजार धारणा को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।
निवेशकों के लिए अब यह समझना महत्वपूर्ण हो गया है कि बिटकॉइन का मूल्य केवल उसके सीमित होने पर आधारित नहीं बल्कि यह व्यापक आर्थिक कारकों, बाजार धारणा और वास्तविक उपयोग से भी प्रभावित होता है। इसलिए जोखिम और लाभ दोनों के पक्ष को ध्यान में रखकर निर्णय लेना आवश्यक है।
ऐसी ही और ख़बरों और क्रिप्टो विश्लेषण के लिए हमें X पर फ़ॉलो करें, ताकि कोई भी अपडेट आपसे न छूटे!

