भारत डिजिटल अग्रणी राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इसका नवीनतम उदाहरण है ई-रुपये को घरेलू उपयोग से आगे बढ़ाकर सीमापार भुगतान और अंतरराष्ट्रीय कारोबार में शामिल करने की योजना। केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) के रूप में विकसित ई-रुपये को अब सिर्फ तकनीकी प्रयोग या घरेलू भुगतान समाधान के रूप में नहीं देखा जा रहा है, बल्कि यह भारत की आर्थिक और वैश्विक वित्तीय रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा बनता जा रहा है।
ई-रुपया क्या है?
ई-रुपया भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी डिजिटल रुपया है, जो सिक्कों और नोटों की तरह ही भारतीय रुपये का डिजिटल रूप है, परंतु यह कंप्यूटर नेटवर्क और डिजिटल वॉलेट के माध्यम से प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य नकद को डिजिटल रूप में बदलकर लेनदेन को अधिक सहज, सुरक्षित और त्वरित बनाना है।
सीमापार लेनदेन की चुनौतियों का समाधान
परंपरागत अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली में कई दिक्कतें हैं जैसे उच्च शुल्क, मध्यस्थ बैंकों की आवश्यकता, धीमी प्रक्रिया और पारदर्शिता की कमी। आज की दुनिया में कई व्यवसाय, प्रवासी श्रमिक और यात्रियों को इन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। ई-रुपये के माध्यम से सीधे लेनदेन और अंतिम निपटान संभव हो सकता है, जिससे समय और लागत दोनों में भारी बचत हो सकती है।
ई-रुपये के वैश्विक उपयोग के पीछे की मुख्य रणनीतियाँ
भारत सरकार और आरबीआई के नजरिये से ई-रुपये को सीमापार उपयोग के लिये विकसित करने के पीछे कई मुख्य कारण हैं:
1. प्रेषण लागत और समय में कमी
भारत दुनिया के प्रमुख प्रेषण प्राप्तकर्ता देशों में से एक है। पारंपरिक तरीकों में अक्सर कार्य प्रेषण और प्राप्ति में समय और शुल्क की बाधा आती है। ई-रुपये के प्रयोग से सीधे और कम लागत वाले लेनदेन संभव होंगे, जिससे प्रवासी मजदूर और उनके परिवार लाभान्वित होंगे।
2. व्यापार और पर्यटन के लिये आसान निपटान
आरबीआई विविध देशों के डिजिटल मुद्राओं को जोड़ने के विचार पर काम कर रहा है, खासकर ब्रिक्स देशों के साथ। इससे व्यापार और पर्यटन के लिए भुगतान और निपटान अधिक सरल और तेज होंगे तथा डॉलर पर निर्भरता कम होगी।
3. रुपये का वैश्विक उपयोग बढ़ाना
भारत वर्षों से रुपये को अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय लेनदेन में अधिक से अधिक शामिल करने पर जोर दे रहा है। ई-रुपये के माध्यम से इसे सुरक्षित, बिना मध्यस्थों के और त्वरित ढंग से उपयोग करने का अवसर मिलेगा।
4. निजी स्टेबलकॉइन के विकल्प के रूप में नियंत्रित समाधान
अमेरिकी डॉलर-आधारित स्टेबलकॉइन और अन्य निजी डिजिटल संपत्तियाँ लोकप्रिय हो रही हैं, आरबीआई इन पर निगरानी व नियंत्रण की सीमाओं को देखते हुए ई-रुपये को एक नियंत्रित और सुरक्षित विकल्प के रूप में पेश करता है।
प्रयोग और प्रगति
मार्च 2025 तक ई-रुपये का मूल्य लगभग ₹1,096 करोड़ तक पहुँच चुका है, जो पिछले वर्ष की तुलना में कई गुना अधिक है। इस प्रगति से यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल मुद्रा धीरे-धीरे लोकप्रिय हो रही है और इसके सीमापार प्रयोग पर विचार भी आरबीआई की रिपोर्ट में शामिल किया गया है।
मुख्य चुनौतियाँ
हालाँकि राज्य और विशेषज्ञ ई-रुपये के वैश्विक विस्तार को लेकर आशान्वित हैं, तकनीकी मानकीकरण, शासन ढांचा, अनुपालन आवश्यकताएँ और निपटान असंतुलन जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं। इन चुनौतियों को हल करने के लिये व्यापक सहयोग और रणनीतिक निर्णय आवश्यक है।
निष्कर्ष
ई-रुपया सिर्फ डिजिटल भुगतान का एक विकल्प नहीं रहा। यह अब भारत की अर्थव्यवस्थाओं को अधिक सुदृढ़ तथा वैश्विक वित्तीय प्रणाली का एक अभिनव हिस्सा बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन चुका है। सीमापार लेनदेन के लिये ई-रुपये की क्षमता देशों के बीच वित्तीय सहयोग और व्यापार को सरल बनाने में मदद कर सकती है, साथ ही रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ावा दे सकती है। भविष्य में इसके विस्तृत प्रयोग से भारत वैश्विक वित्तीय मानचित्र पर अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।
ऐसी ही और ख़बरों और क्रिप्टो विश्लेषण के लिए हमें X पर फ़ॉलो करें, ताकि कोई भी अपडेट आपसे न छूटे!
