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Rajeev Ranjan Roy
लेखक: Rajeev Ranjan Royस्टाफ लेखक
Pratik Bhuyan
Pratik Bhuyan द्वारा समीक्षितस्टाफ संपादक

क्रिप्टो साइबर मामलों में दिल्ली HC का आदेश: बैंक खाते की पूरी फ्रीजिंग नहीं

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि क्रिप्टो साइबर मामलों में सिर्फ विवादित राशि फ्रीज की जाए, पूरी राशि नहीं, ताकि व्यक्ति का जीवन अधिकार प्रभावित न हो

क्रिप्टो साइबर मामलों में दिल्ली HC का आदेश: बैंक खाते की पूरी फ्रीजिंग नहीं
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने क्रिप्टोकरेंसी–साइबर जांच के एक याचिका मामले में महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए कहा है कि जब बैंक खाते में विवादित धनराशि स्पष्ट रूप से पहचानी जा सके, तो पूरे खाते को फ्रीज करना उचित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल विवादित राशि पर रोक लगाई जानी चाहिए, ताकि खाताधारक को अतिरिक्त कठिनाइयाँ न उठानी पड़े। यह निर्देश न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की एकल पीठ ने 13 जनवरी 2026 को जारी किया। 

आदेश में कहा गया कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 102 के तहत पुलिस को समग्र संपत्ति जप्त करने का अधिकार तो है, लेकिन इसे संतुलन और अनुपात के सिद्धांत (प्रोपोर्शनैलिटी) से ही प्रयोग करना चाहिए। यही सिद्धांत वैधानिक प्रयोजन की पूर्ति के लिए पर्याप्त है, न कि किसी व्यक्ति की वित्तीय हालत को पूरी तरह जबरन बाधित करने के लिए।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, जो एक पूर्णकालिक क्रिप्टोकरेंसी ट्रेडर हैं, ने अपने बचत खाते पर लगे बैंक फ्रीज के खिलाफ न्यायालय का रुख किया। बिहार, तमिलनाडु, हरियाणा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के पुलिस विभागों द्वारा भेजे गए नोटिस के आधार पर खाते में पीयर–टू–पीयर (P2P) लेनदेन को साइबर अपराध जांच में संदिग्ध बताते हुए खाते पर रोक लगा दी गई थी।

याचिकाकर्ता ने कहा कि वे किसी भी प्राथमिकी में मुख्य आरोपी नहीं हैं और विवादित राशि मात्र लगभग 1.63 लाख रुपये थी, लेकिन पूरे खाते को बंद कर दिया गया। यह कदम उनके जीविकोपार्जन के अधिकार के खिलाफ है और न्याय के आम सिद्धांतों के विरुद्ध है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब यानी संदिग्ध धनराशि को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सकता है, तो उसी राशि पर रोक लगाना पर्याप्त है और बैंक खाते का बाकी शेष भाग तुरंत उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

इसीलिए अदालत ने बैंक को निर्देश दिया कि वह विवादित हिस्से को छोड़ बाकी बैलेंस को तुरंत अनफ्रीज़ करे ताकि याचिकाकर्ता अपने खाते का सामान्य संचालन जारी रख सके।

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केवल विवादित राशि पर रोक

न्यायालय का यह कदम पिछले वर्ष से जारी बैंकों और जांच एजेंसियों के अनुचित और व्यापक फ्रीज़िंग रिवाजों पर चिंताओं को बल देता है।

विभिन्न उच्च न्यायालयों में भी इसी तरह के रुख देखे गए हैं, जिसमें कहा गया है कि बैंक खातों को पूरी तरह बंद रखने की बजाय केवल विवादित राशि पर रोक लगाई जानी चाहिए। उदाहरण के तौर पर, राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी इसी सिद्धांत का समर्थन किया है कि खाताधारक की आर्थिक स्वतंत्रता को बिना कारण बाधित नहीं किया जाना चाहिए।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी हाल ही में साइबर फ्रॉड से पीड़ितों को राहत देने के लिए दिशानिर्देश जारी किए, जिसके मुताबिक खाते 90 दिनों के भीतर अनफ्रीज़ किए जाने चाहिए, जिससे पीड़ितों को राहत मिल सके।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय साइबर अपराध के मामलों में न्याय और सतर्कता के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। क्रिप्टोकरेंसी और डिजिटल वित्तीय लेनदेन में बढ़ते मामलों के बीच, आर्थिक अधिकारों की रक्षा करते हुए जांच प्रक्रियाओं को प्रभावी बनाना आवश्यक है।

निष्कर्ष

दिल्ली उच्च न्यायालय का यह आदेश डिजिटल आर्थिक मामलों में न्याय के सिद्धांत और व्यक्तिगत वित्तीय स्वतंत्रता के संरक्षण के बीच एक सशक्त संतुलन स्थापित करता है।

अब जब विवादित रकम स्पष्ट है, तो केवल वही राशि लीने के लिए रोक लगाई जाएगी, जबकि खाताधारक को अपने शेष धन पर नियंत्रण का अधिकार मिल सकेगा, जो न्याय व्यवस्था की मानवतापूर्ण सोच को दर्शाता है।

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