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Rajeev Ranjan Roy
लेखक: Rajeev Ranjan Royस्टाफ लेखक
Pratik Bhuyan
Pratik Bhuyan द्वारा समीक्षितस्टाफ संपादक

भारत में ठोस क्रिप्टो ढांचा पर संशय बरक़रार, प्रणालीगत जोखिमों का हवाला

नई दिल्ली व्यापक कानून की बजाय आंशिक निगरानी को तरजीह दे रही है। रिज़र्व बैंक ने चेतावनी दी है कि पूर्ण नियमन क्रिप्टो को वैधता प्रदान कर सकता है और वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा बन सकता है।

भारत में ठोस क्रिप्टो ढांचा पर संशय बरक़रार, प्रणालीगत जोखिमों का हवाला
विश्लेषण

भारत व्यापक कानूनी ढांचा बनाने से पीछे हट रहा है। रॉयटर्स द्वारा देखे गए एक सरकारी दस्तावेज़ के अनुसार, सरकार ने क्रिप्टोकरेंसी पर सतर्क रुख अपनाया है ताकि डिजिटल संपत्तियों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली में शामिल करने की बजाय वित्तीय स्थिरता को प्राथमिकता दी जा सके।

यह दस्तावेज़, जो इस महीने का है, दर्शाता है कि नियामक इस आशंका में हैं कि औपचारिक नियमन से सट्टा-आधारित क्रिप्टो बाज़ारों को वैधता मिल जाएगी और अंततः यह क्षेत्र "प्रणालीगत" बन सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था नए झटकों के प्रति असुरक्षित हो जाएगी।

इस सतर्कता के केंद्र में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) है। बैंक का कहना है कि पारंपरिक नियामक औज़ार अस्थिर टोकनों, विकेंद्रीकृत ट्रेडिंग और पीयर-टू-पीयर लेन-देन से पैदा होने वाले जोखिमों को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

दस्तावेज़ में कहा गया है कि केंद्रीय बैंक के अनुसार, विनियमन सीमा पार प्रवाह या विकेंद्रीकृत एक्सचेंजों पर गतिविधियों को पूरी तरह रोक नहीं पाएगा। ऐसे में यदि इसे वैधता मिल जाती है तो व्यापक अपनाने की संभावना और भी बढ़ जाएगी, जो प्रतिकूल परिणाम दे सकती है।

भारत का यह रुख उन बड़े देशों से अलग है जिन्होंने हाल के वर्षों में क्रिप्टो नियमों को औपचारिक रूप देने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। अमेरिका, जापान और यूरोप के कुछ हिस्सों में जहां क्रिप्टो को नियामकीय ढांचे में शामिल करने की कोशिशें हो रही हैं, वहीं नई दिल्ली केवल आंशिक निगरानी पर ज़ोर दे रही है — जैसे कराधान, एक्सचेंजों का पंजीकरण और मनी लॉन्ड्रिंग रोधी जांच। व्यापक कानून जो क्रिप्टो को बैंकिंग और भुगतान प्रणाली में शामिल कर सके, वह फिलहाल एजेंडे पर नहीं है।

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नीति-निर्माता स्थिरमुद्राओं (स्टेबलकॉइन) को लेकर भी विशेष रूप से सतर्क हैं। दस्तावेज़ में चेतावनी दी गई है कि यदि डॉलर-आधारित स्थिरमुद्राओं का व्यापक उपयोग शुरू हो गया तो यह भारत के यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) को कमजोर कर सकता है और मौद्रिक नियंत्रण पर असर डाल सकता है।

पूर्व RBI अधिकारियों और उद्योग विशेषज्ञों ने सरकार से अपील की है कि वह स्टेबलकॉइन से जुड़े नियम जल्द स्पष्ट करे, क्योंकि देरी निवेशकों और व्यवसायों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा कर रही है।

फिर भी अधिकारी स्वीकार करते हैं कि भारतीयों के पास मौजूद क्रिप्टो संपत्तियों का मौजूदा स्तर — जिसका अनुमान लगभग 4.5 अरब डॉलर है — अभी तक प्रत्यक्ष प्रणालीगत खतरा नहीं है। हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि अपनाने की गति तेज़ हो गई या यदि नए साधनों से क्रिप्टो का बैंकों की बैलेंस शीट से सीधा संबंध बन गया तो जोखिम कहीं बड़ा हो सकता है।

आलोचकों का कहना है कि ज़्यादा सतर्कता नवाचार को दबा सकती है और गतिविधियों को ऑफशोर धकेल सकती है। वहीं समर्थकों का तर्क है कि मापी-तौली निगरानी उपभोक्ताओं और वित्तीय प्रणाली दोनों को बचाती है।

उद्योग समूह और कानूनी विशेषज्ञ बार-बार इस बात पर ज़ोर देते हैं कि ऐसा संतुलित ढांचा बने जो सट्टा-आधारित टोकनों और स्थिर व प्रोग्राम योग्य टोकनों के बीच फर्क कर सके, ताकि वास्तविक उपयोग वाले डिजिटल साधनों को बढ़ावा मिले। फिलहाल, नीति निर्माण की दिशा तय करने में RBI का सतर्क रुख निर्णायक साबित हो रहा है।

वैश्विक नियामकीय परिदृश्य तेजी से बदल रहा है — अमेरिका और अन्य बाज़ारों में हाल के कदम कुछ क्रिप्टो गतिविधियों और स्थिरमुद्राओं को समायोजित करने की ओर इशारा करते हैं। भारतीय अधिकारी कहते हैं कि वे बड़े देशों की मिसालें देखने के बाद ही व्यापक सुधारों पर विचार करेंगे। उनकी चुनौती यह है कि फिनटेक नवाचार को अनुमति दें, लेकिन क्रिप्टो बाज़ारों को वित्तीय अस्थिरता का वाहक बनने से रोकें।

निष्कर्ष

 नई दिल्ली का मौजूदा रुख अपनाने की बजाय संयम और नियंत्रण का है। व्यापक क्रिप्टो ढांचा टालकर भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अस्थिर बाज़ार को वैधता न मिले और उसकी भुगतान प्रणाली व मौद्रिक नीति बाधित न हो। लेकिन इसके साथ ही यह रास्ता कारोबारियों और निवेशकों को अनिश्चित नियामकीय माहौल में छोड़ देता है।

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