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Rajeev Ranjan Roy
लेखक: Rajeev Ranjan Royस्टाफ लेखक
Pratik Bhuyan
Pratik Bhuyan द्वारा समीक्षितस्टाफ संपादक

भारत ने अमेरिकी बॉन्ड घटाए, सोने के भंडार में इज़ाफ़ा किया

वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत ने सुरक्षित निवेश पर भरोसा जताया, अमेरिकी ट्रेज़री होल्डिंग्स में कमी और 39 टन सोने की ख़रीद से बदला आरक्षित रणनीति का संतुलन।

भारत ने अमेरिकी बॉन्ड घटाए, सोने के भंडार में इज़ाफ़ा किया
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भारत ने अपनी विदेशी मुद्रा आरक्षित रणनीति में अहम बदलाव करते हुए अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड्स की हिस्सेदारी घटाई है और सोने में निवेश को प्राथमिकता दी है। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार भारत की अमेरिकी ट्रेज़री होल्डिंग्स जून 2024 में घटकर 227 अरब डॉलर रह गईं, जो इससे पहले 242 अरब डॉलर थीं। वहीं, इसी अवधि में भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने अपने सोने के भंडार में लगभग 39 टन का इज़ाफ़ा किया है। यह रुख वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य के मद्देनज़र भारत की सोच को दर्शाता है।

अमेरिकी बॉन्ड पर निर्भरता में कमी

अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड्स को लंबे समय से सुरक्षित और स्थिर निवेश का प्रतीक माना जाता है। दुनियाभर के कई देश अपनी विदेशी मुद्रा भंडार का बड़ा हिस्सा इनमें रखते हैं। भारत भी अब तक इन्हीं बॉन्ड्स में भारी निवेश करता रहा है। लेकिन हाल के महीनों में बढ़ती महंगाई, अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की ब्याज दर नीतियां और डॉलर पर दबाव जैसी वजहों से भारत ने धीरे-धीरे इस निर्भरता को कम करना शुरू कर दिया है।

227 अरब डॉलर पर पहुंच चुकी यह हिस्सेदारी अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन 15 अरब डॉलर की कटौती यह संकेत देती है कि आरबीआई निवेश को और विविधतापूर्ण बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

सोने में भरोसा

दूसरी ओर, सोना पारंपरिक रूप से सुरक्षित निवेश और संकट काल में स्थिर संपत्ति के रूप में देखा जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, और वैश्विक वित्तीय बाज़ारों में बढ़ती अस्थिरता ने सोने को एक बार फिर सुरक्षित विकल्प बना दिया है। भारत ने इसी संदर्भ में अपने सोने के भंडार को बढ़ाते हुए लगभग 39 टन की खरीद की है।

अब भारत का कुल आधिकारिक सोना भंडार 850 टन से अधिक हो गया है। यह स्पष्ट करता है कि भारत अपनी आरक्षित संपत्तियों का संतुलन बदलते समय की ज़रूरतों के हिसाब से ढाल रहा है।

भू-राजनीतिक और आर्थिक कारक

अमेरिका और चीन के बीच जारी तनाव, डॉलर के प्रभुत्व को चुनौती देने वाले नए गठजोड़, और कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की स्थानीय मुद्रा आधारित व्यापार प्रणाली पर ज़ोर—ये सब ऐसे कारक हैं जिनकी वजह से भारत जैसे देशों के लिए अपनी आरक्षित रणनीति पर पुनर्विचार करना ज़रूरी हो गया है।

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सोने की ख़रीद को इस लिहाज़ से भी देखा जा रहा है कि यह भारत की वित्तीय स्वायत्तता को और मज़बूती देती है। भविष्य में यदि डॉलर पर दबाव बढ़ता है या वैश्विक बाज़ारों में अनिश्चितता तेज़ होती है, तो सोना भारतीय रिज़र्व बैंक के लिए सुरक्षा कवच का काम करेगा।

विशेषज्ञों की राय

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि भारत का यह कदम "सावधानीपूर्ण विविधीकरण" की दिशा में है। उनका मानना है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार मज़बूत स्थिति में है। लेकिन अमेरिकी बॉन्ड्स से धीरे-धीरे दूरी बनाकर और सोने पर अधिक भरोसा करके, आरबीआई यह सुनिश्चित कर रहा है कि वैश्विक झटकों से भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत सुरक्षित रहे। इसके अलावा, कुछ विशेषज्ञ इसे "डि-डॉलराइज़ेशन" की वैश्विक प्रवृत्ति से भी जोड़कर देख रहे हैं। रूस, चीन और कुछ पश्चिम एशियाई देशों ने भी डॉलर आधारित निवेश को कम कर सोने और अन्य मुद्राओं में संतुलन बनाने पर ध्यान बढ़ाया है।

निष्कर्ष

भारत का अमेरिकी ट्रेज़री होल्डिंग्स घटाना और सोने के भंडार में इज़ाफ़ा करना सिर्फ़ निवेश रणनीति का बदलाव नहीं है, बल्कि यह बदलते वैश्विक वित्तीय परिदृश्य का प्रतिबिंब भी है। यह कदम दर्शाता है कि भारत अब अपनी आरक्षित संपत्तियों को केवल डॉलर पर केंद्रित न रखकर सुरक्षित और स्थायी विकल्पों की ओर बढ़ रहा है। आने वाले समय में यह नीति भारत की आर्थिक मज़बूती और वैश्विक वित्तीय अस्थिरताओं से निपटने की क्षमता को और सुदृढ़ करेगी।

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