भारत की वित्तीय खुफिया इकाई Financial Intelligence Unit (FIU) ने क्रिप्टो एक्सचेंजों के लिए KYC और AML (एंटी मनी लॉन्ड्रिंग) नियमों को और अधिक कड़ा कर दिया है। इन नए नियमों के तहत अब उपयोगकर्ताओं को लाइव सेल्फी, भौगोलिक स्थान डेटा और विस्तृत पहचान निगरानी की प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य होगा जब वे किसी क्रिप्टो प्लेटफॉर्म पर खाता बनाते हैं। यह कदम डिजिटल एसेट इकोसिस्टम में पारदर्शिता और सुरक्षा बढ़ाने के उद्देश्य से उठाया गया है।
FIU ने 8 जनवरी 2026 को जारी दिशानिर्देशों में कहा है कि सभी पंजीकृत क्रिप्टो एक्सचेंज, जिन्हें अब Virtual Digital Asset (VDA) सेवा प्रदाता के रूप में माना जाएगा, को अपने नए ग्राहकों की पहचान सत्यापित करने के लिए सख्त प्रक्रियाएं लागू करनी होंगी। इसके तहत उपयोगकर्ता को मोबाइल या लैपटॉप के ज़रिये लाइव सेल्फी प्रदान करनी होगी जिसमें उनकी आंखों और सिर की हलचल को ट्रैक करने वाली विशेष सॉफ़्टवेयर तकनीक का उपयोग किया जाता है ताकि डीपफेक या नकली फोटो के उपयोग से बचा जा सके।
लाइव सेल्फी और जियो-टैगिंग की अनिवार्यता
नए नियमों में उपयोगकर्ताओं का भौगोलिक स्थान (latitude-longitude), IP पता और समय-तारीख भी रिकॉर्ड किया जाएगा। इसका लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि खाता बनाने वाला व्यक्ति वास्तव में वह है जिसका दावा कर रहा है, और कहीं से भी फ़र्जी या संदिग्ध गतिविधि को रोका जा सके।
इसके अलावा, उपयोगकर्ताओं को ईमेल और मोबाइल नंबर की OTP सत्यापन, पैन कार्ड और दूसरे सरकारी फोटो पहचान पत्र जैसे आधार, पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र जैसी अधिक पहचान दस्तावेज़ उपलब्ध कराना ज़रूरी होगा। बैंक खाते को सत्यापित करने के लिए Re 1 का छोटा लेनदेन (penny drop) भेजकर यह पुष्टि करनी होगी कि यह खाता वास्तव में उपयोगकर्ता का है।
उद्देश्य और प्रभाव
FIU के अनुसार यह कदम कानूनी और अवैध गतिविधियों से जुड़े जोखिम को कम करने के लिए उठाया गया है। नई प्रक्रियाएँ पैसे की धोखाधड़ी, आतंकवादी वित्त पोषण और अन्य अवैध गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करेंगी। एजेंसी का मानना है कि यह पारदर्शिता बढ़ाएगा और डिजिटल एसेट मार्केट को अधिक सुरक्षित बनाएगा।
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विश्लेषकों के मुताबिक, भारत में क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मुद्रा के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, लेकिन आयकर कानून के तहत डिजिटल एसेट से मिलने वाले लाभ पर टैक्स लागू होता है। ऐसे में KYC और AML नियमों के कड़े होने से टैक्स चोरी और गुमनाम लेनदेन के मामलों को बेहतर तरीके से ट्रैक किया जा सकेगा।
खतरे और जागरूकता
नई दिशानिर्देशों के अनुसार एक्सचेंजों को अपने “हाई-रिस्क” ग्राहकों का हर छह महीने में KYC अपडेट करना होगा जबकि अन्य ग्राहकों के लिए यह प्रक्रिया सालाना होगी। खतरा अधिक समझे जाने वाले व्यक्तियों में राजनीतिक रूप से उजागर व्यक्ति (PEPs), कर शरण देशों से जुड़े उपयोगकर्ता और ऐसे ग्राहक शामिल हैं जिनके डेटा स्रोत बाहरी रिपोर्टिंग या स्वतंत्र डेटाबेस से जुड़े हैं।
FIU ने यह भी स्पष्ट किया है कि ICO (Initial Coin Offering) और ITO (Initial Token Offering) जैसी गतिविधियाँ, जिनका कोई स्पष्ट आर्थिक आधार नहीं होता, जोखिम भरी मानी जाएंगी और इन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाएगा। इसी तरह अनाम पहचान वाले टोकन, टम्बलर और मिक्सर सेवाएँ जिनसे ट्रांजेक्शन का स्रोत छिपाया जा सकता है, उन्हें भी रोका जाएगा और पंजीकृत एक्सचेंजों को ऐसे लेनदेन में सहायता नहीं करनी चाहिए।
बाजार तथा उपयोगकर्ता प्रतिक्रिया
क्रिप्टो उद्योग में यह बदलाव कुछ उपयोगकर्ताओं और प्लेटफॉर्म के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि अब उपयोगकर्ताओं को पहले की तुलना में अधिक डॉक्यूमेंटेशन और सत्यापन परीक्षण से गुजरना होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे शुरुआत में ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया थोड़ी धीमी हो सकती है, लेकिन दीर्घकाल में यह देश में क्रिप्टो बाजार की विश्वसनीयता और सुरक्षा को बढ़ाएगा।
संक्षेप में, भारत ने क्रिप्टो उपयोगकर्ता ऑनबोर्डिंग प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाकर AML और KYC मानकों को मजबूत किया है, ताकि अवैध लेनदेन एवं धोखाधड़ी को नियंत्रण में लाया जा सके और निवेशकों तथा प्लेटफॉर्म दोनों के हितों की रक्षा की जा सके।
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