पाकिस्तान द्वारा क्रिप्टोकरेंसी को वैध बनाने और सेंट्रल बैंक समर्थित डिजिटल मुद्रा (CBDC) पेश करने की दिशा में उठाए जा रहे हालिया कदम दक्षिण एशिया की रणनीतिक स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।

आर्थिक बदहाली, लगातार IMF बेलआउट और गहरी संरचनात्मक कमजोरियों से जूझते इस देश द्वारा क्रिप्टो को अपनाना न केवल इसकी अर्थव्यवस्था के लिए अव्यावहारिक है बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती प्रस्तुत करता है।

पाकिस्तान की नई कूटनीतिक बाज़ी

4 नवंबर 2024 को अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से एक दिन पहले, स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (SBP) ने क्रिप्टोकरेंसी को लीगल टेंडर बनाने के उद्देश्य से नीतिगत प्रस्तावों की घोषणा की। 

साथ ही पाकिस्तान ने बिटकॉइन आधारित एक नया रणनीतिक रिज़र्व बनाने का ऐलान भी किया, एक ऐसा कदम जिस पर डोनाल्ड ट्रंप की ओर से मिली कथित प्रेरणा को पाक सरकार ने खुलकर स्वीकार किया है।

ट्रंप परिवार की हिस्सेदारी वाली वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल के साथ पाकिस्तान डिजिटल एसेट्स अथॉरिटी की साझेदारी ने वैश्विक विवाद को और गहरा कर दिया है।

ट्रंप प्रशासन के संभावित दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान के प्रति नरम रुख़ की अटकलें इस पहल को नया राजनीतिक आयाम देती हैं।

यदि अमेरिका दोबारा पाकिस्तान को रणनीतिक रूप से महत्व देता है, भारत-पाक रिश्तों को जोड़ने का दबाव बनाता है और इस्लामाबाद की सैन्य प्रतिष्ठान को परोक्ष वैधता मिलती है, तो इससे भारत के हितों को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।

अर्थव्यवस्था पर खतरा, लेकिन राजनीतिक फायदा

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से वित्तीय कुप्रबंधन, संकीर्ण कर आधार, उच्च कर्ज़, विदेशी निवेश की कमी और ऊर्जा आयात पर भारी निर्भरता के कारण कमजोर बनी हुई है। IMF उसे अब तक 25 बार बेलआउट दे चुका है, जो स्वयं इसकी प्रणालीगत नाकामी का प्रमाण है।

ऐसे देश में क्रिप्टो को रिज़र्व एसेट के रूप में अपनाना अस्थिरता को और बढ़ाएगा। क्रिप्टोकरेंसी की कीमतें अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाली होती हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार स्थिर रखने का मूल उद्देश्य ही ध्वस्त हो सकता है।

यदि डॉलर आधारित स्टेबलकॉइन्स के कारण अर्थव्यवस्था वास्तविक डॉलराइज़ेशन की ओर बढ़ती है, तो पाकिस्तानी रुपये (PKR) की मांग और गिर सकती है, जिससे मुद्रा अवमूल्यन, महंगाई और आयात बिल में वृद्धि जैसे संकट और गहरे होंगे।

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उधर पाकिस्तान में पहले से ही लगभग दो करोड़ क्रिप्टो उपयोगकर्ता मौजूद हैं जो इसके औपचारिक कैपिटल मार्केट में निवेश करने वाले लोगों से अनेक गुना अधिक हैं।

ऐसे में क्रिप्टो को लीगल टेंडर बनाने के फैसले से बैंकिंग प्रणाली, मौद्रिक नीति और कर संग्रह क्षमता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

आतंक के फंडिंग नेटवर्क

भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पाकिस्तान का नया क्रिप्टो इकोसिस्टम उसके ‘मिलिट्री-जिहादी कॉम्प्लेक्स’ के हाथों में एक नया उपकरण बन सकता है।

क्रिप्टो की छद्म-नाम वाली और सीमा रहित प्रकृति पहले से ही आतंकवादी संगठनों जैसे हमास और इस्लामिक स्टेट ख़ुरासान प्रांत (ISKP) द्वारा इस्तेमाल होती रही है।

ऐसी तकनीकों का औपचारिक वैधीकरण पाकिस्तान में MJC को प्रतिबंधों से बचने, सीमा-पार गतिविधियों को वित्त देने और अवैध पूंजी प्रवाह को छुपाने में और सक्षम बना सकता है।

ब्लॉकचेन आधारित हवाला और भारत की खुफिया चुनौती

हवाला प्रणाली पहले ही भारत के लिए सुरक्षा जोखिम है। यदि यह ब्लॉकचेन सक्षम हो जाती है तो यह लगभग पूर्णत: अनट्रेसेबल हो सकती है। 

पाकिस्तान, UAE और सिंगापुर जैसे ठिकानों पर बढ़ते क्रिप्टो हब भारत के लिए नई चुनौती उत्पन्न करते हैं, क्योंकि इसके असर से भारत पर घरेलू स्तर पर क्रिप्टो को लेकर नीतिगत ढील का दबाव बन सकता है, जिससे अवैध पूंजी बहिर्वाह के नए रास्ते खुल सकते हैं।

IMF ने पाकिस्तान के बिटकॉइन माइनिंग सब्सिडी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जो संकेत देता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पाकिस्तान के क्रिप्टो प्रयोगों से आशंकित हैं। 

लेकिन अंतरराष्ट्रीय समर्थन के अभाव के बावजूद इस कदम से पाकिस्तान को मिलने वाला अल्पकालिक कूटनीतिक लाभ भारत के लिए तत्काल रणनीतिक चिंता का विषय है।

भारत को सतर्क रहने की जरूरत

पाकिस्तान का क्रिप्टो अपनाना उसके आर्थिक संकट का समाधान नहीं बल्कि एक खतरनाक मोड़ साबित हो सकता है। लेकिन इससे भी बड़ा खतरा यह है कि यह कदम सीमा पार आतंक वित्तपोषण, प्रतिबंध चोरी और अवैध पूंजी प्रवाह के लिए नए रास्ते खोल सकता है।

भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह पाकिस्तान के क्रिप्टो क्षेत्र के विकास पर बारीकी से निगरानी रखे, अपनी खुफिया क्षमताओं को तकनीकी रूप से उन्नत करे और आवश्यकता पड़ने पर ऐसी नीतिगत प्रतिक्रिया दे जो देश की आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को सुरक्षित रख सके।

पाकिस्तान का क्रिप्टो प्रयोग भले ही अस्थायी राजनीतिक लाभ के लिए किया गया दांव हो, लेकिन इसके रणनीतिक दुष्परिणाम भारत के लिए दीर्घकालिक और गंभीर हो सकते हैं।


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